Saturday, April 12, 2014

पुन्हाना में पुलिस फोर्स तैनात

मतदान के दिन मेवात के पुन्हाना विधानसभा क्षेत्र के अंर्तगत नकनपुर में हुई हिंसा के बाद से कस्बे में तनाव का माहौल है। इलाके में शांति बहाल करने के लिए पुलिस ने फ्लैग मार्च किया। स्थिति का जायजा लेने के लिए रेवाड़ी रेंज के आईजी सत्यप्रकाश रंगा ने दौरा किया। दोनों पक्षों ने एक दूसरे के खिलाफ मामला दर्ज करने के लिए पुलिस को शिकायत दे दी है।
http://dainiktribuneonline.com/2014/04/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%B8-%E0%A4%AB%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B8/
 

Friday, April 11, 2014

हिंदुओं को शरण देता एक घोषणापत्र

http://prabhatkhabar.com/news/105675-Hindus-shelter-placard.html
इन महत्वपूर्ण आर्थिक बिंदुओं के साथ-साथ नरेंद्र मोदी सरकार का ध्यान दुनिया भर के सताये हुए, पीड़ित और अत्याचार के शिकार हिंदुओं के प्रति भी होगा. वेबसाइट पर पार्टी के घोषणापत्र को पढ़ने के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदुओं में एक बहुत बड़ी राहत की लहर दौड़ गयी है. भारत के इतिहास में पहली बार किसी राजनीतिक पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में यह लिखने का साहस दिखाया है कि भारत दुनिया भर के सताये हुए हिंदुओं का शरणस्थल रहेगा और दुनिया में कहीं भी किसी भी हिंदू पर कोई अत्याचार होगा, तो वह भारत की ओर ही इसे अपना मूल निवास समझते हुए देखेगा. 

Thursday, April 10, 2014

बजरंगबली की प्रतिमा कुएं में फेंकी, बवाल

http://www.jagran.com/jharkhand/hazaribagh-11220657.html
इचाक : अवैध रूप से पत्थर खनन करनेवाले माफिया की मनमानी का मामला प्रकाश में आया। बेतहाशा लाभ की चाहत में माफिया ने आदमी तो आदमी भगवान को भी नहीं बख्शा। ताजा मामला प्रखंड के डुमरौन गांव के मूर्तियां टोला का है जहां पत्थर माफिया के एक दल ने गांव में स्थापित बजरंग बली की प्रतिमा को उखाड़ कर कुएं में फेंक दी। वहीं रामनवमी के दिन भगवान का अनादर देख कर ग्रामीण आक्रोशित हो गए। सैकड़ों ग्रामीणों ने जमकर बवाल काटा है।

Wednesday, April 9, 2014

कानपुर में आज फिर भड़की हिंसा, अघोषित क‌र्फ्यू लगाया गया


http://www.jagran.com/news/national-today-violence-in-kanpur-stone-throwing-11220948.html
कानपुर में रामनवमी की शाम जुलूस को लेकर हुए उपद्रव के बाद आज सुबह तक तनातनी जारी है। सुबह फिर कुछ लोगों ने शहर का माहौल बिगाड़ने की कोशिश की। उपद्रवग्रस्त इलाके सुंदरनगर में सुबह कुछ लोगों ने पथराव किया। रात में एक मंदिर के सामने आपत्तिजनक चीजें फेंकी गई। इससे दोनों पक्षों के लोग एक बार फिर आमने सामने आ गए। दोनो पक्षों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होने से पहले पुलिस ने मामले को संभाल लिया है। इन मामलों में पुलिस ने कई उपद्रवियों को हिरासत में लिया हैं। एहतियातन पूरे इलाके में अघोषित क‌र्फ्यू लगा दिया गया है।

Monday, April 7, 2014

अब मुस्लिमों के आसरे मुल्क की सियासत!

http://www.palpalindia.com/2014/04/07/loksabha-election-politics-muslim-nations-shelter-news-hindi-india-57393.html
लोकसभा चुनाव के मतदान का पहला चरण आते-आते विचारधारा, विकास, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे हवा हो गए हैं. वोटों की राजनीति में जातियों के समीकरण को कमजोर देख राष्ट्रीय पार्टियां भी ध्रुवीकरण की राह पर चल दी हैं. आपातकाल के बाद सबसे कठिन चुनावों के मुकाबिल खड़ी कांग्रेस के लिए अल्पसंख्यक वोट संजीवनी बन सकते हैं. तमाम पार्टियां इन वोटों के बिखराव को रोकने के लिए इमाम और उलमा की शरण में हैं.

Sunday, April 6, 2014

नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो

http://www.jagran.com/uttarpradesh/sidharthnagar-11212668.html
शुक्रवार की शाम ने शोहरतगढ़ के नाम को और बदनाम कर दिया, वह जिसके लिए कुख्यात है। बात सिर्फ इतनी थी कि शोहरतगढ़ कस्बे से धार्मिक श्रद्धालुओं की एक पदयात्रा गुजरनी थी। कस्बे में साप्ताहिक बाजार होने से श्रद्धालुओं ने रास्ता बदल लिया। वह निकल पड़े नगर की जामा मस्जिद की तरफ। यह बात भी सुनने में आ रही हैं कि जुलूस में शामिल कुछ उपद्रवियों ने इस दौरान कुछ नारेबाजी की। परिणाम स्वरूप माह भर पूर्व शांति कमेटी की बैठक में एक-दूसरे के सुख का संकल्प लेने वाले खुद को संभाल नहीं पाये। लाठी व वर्दी के जोर पर उन्हें रिश्तों का पाठ पढ़ाने वाली पुलिस भी लहुलुहान हो गई। थानाध्यक्ष डुमरियागंज को सिर में चार टांके लगे हैं। काफी मशक्कत के बाद हालात काबू में है।

Saturday, April 5, 2014

कोबरापोस्ट का स्टिंग 'ऑपरेशन जन्मभूमि' सवालों के घेरे में

http://www.jagran.com/news/national-cobraposts-operation-janmbhoomi-advani-narasimha-rao-knew-of-plot-11208332.html
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। लोकसभा चुनाव के लिए मतदान शुरू होने से चंद दिन पहले अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने के 22 साल पुराने मामले को लेकर सामने आए स्टिंग ऑपरेशन पर सवाल खड़े गए हैं। गड़े मुर्दे उखाड़ने की तर्ज पर कोबरा पोस्ट नामक समाचार वेबसाइट के स्टिंग ऑपरेशन पर भाजपा ने तीखा हमला बोला है। चुनाव आयोग से इसकी शिकायत करते हुए पार्टी ने जांच की मांग की है। वहीं, संप्रग के सहयोगी दल नेशनल कांफ्रेंस के नेता और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी इस समय स्टिंग के सामने आने पर हैरानी जताई है। जबकि कांग्रेस का कहना है कि स्टिंग ने भाजपा और आरएसएस के सही चेहरे को उजागर कर दिया है।

Friday, April 4, 2014

सोनिया-बुखारी की मुलाकात लोमड़ी-भेड़‍िये की अहिंसा पर बात करने जैसा: शिवसेना

http://aajtak.intoday.in/story/maharashtra-udhav-says-sonia-bukhari-meet-like-fox-and-wolf-talking-non-violence-1-759899.html
धर्मनिरपेक्ष वोटों के बंटवारे को रोकने के लिए दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम से मुलाकात करने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को आड़े हाथ लेते हुए शिवसेना ने कहा कि यह 'लोमड़ी और भेड़िये' के अहिंसा और शाकाहार पर बात करने के समान है.

Thursday, April 3, 2014

हिन्दुओं को अपमान सहने की आदत क्यों

http://www.punjabkesari.in/news/article-232630
(तरुण विजय) मुगल, ब्रिटिश और उसके बाद नेहरूवादी सैकुलर तंत्र ने इस देश में आग्रही हिन्दू बनना अपराध घोषित कर दिया था। देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति समर्पण की चरम सीमा तक जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों को आज भी सरकारी नौकरी के योग्य नहीं माना जाता और इस बारे में केन्द्र तथा विभिन्न राज्य सरकारों ने अधिघोषणा जारी की हुई है, जो रद्द नहीं की गई। 15 अगस्त तथा 26 जनवरी के दिन लालकिले और जनपथ पर जो भव्य परेड तथा राष्ट्रीय ध्वज फहराने के कार्यक्रम होते हैं, उनमें अनेक भयानक आरोपों से घिरे मंत्री और राजनेता बुलाए जाते हैं। जिस मुस्लिम लीग ने भारत का विभाजन करवाया, उसके सदस्य और पदाधिकारी भी आमंत्रित किए जाते हैं और उनमें से एक तो केन्द्रीय मंत्रिमंडल के भी सदस्य बनाए गए।

लेकिन कभी विश्व के सबसे बड़े हिन्दू संगठन, जो भारत का महान देशभक्त संगठन है, उसे अधिकृत तौर पर न तो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के यहां चाय पर या राष्ट्रीय दिवसों के कार्यक्रमों में भारत शासन की ओर से अथवा राज्य सरकार की भी ओर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारी के नाते आमंत्रित किया जाता है। अब कुछ भाजपा की राज्य सरकारों ने यदि उन्हें बुलाया हो तो यह अलग बात है। हिन्दुत्व की विचारधारा से आप लाख असहमत हो सकते हैं लेकिन उस विचारधारा को मानने वालों को त्याज्य, अस्पृश्य, अनामंत्रित और सूचीविहीन वर्ग में रखना अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक छुआछूत का उदाहरण है। भारत के 82,000 से ज्यादा समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में सामान्यत: कांग्रेस, वामपंथी या सीधे-सीधे कहें तो उन लेखकों, पत्रकारों और सम्पादकों का प्रभुत्व है, जिनका एक ही मकसद है-हिन्दुत्व की विचारधारा का विरोध। महानगरों से छपने वाले तथाकथित राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में हर दिन जिन लोगों के स्तंभ और लेख छपते हैं, उनमें हिन्दुत्व अथवा भारत के आग्रही हिन्दू समाज की उस विचारधारा का संभवत: एक प्रतिशत भी प्रतिनिधित्व नहीं होता जो राष्ट्रीयता के उस प्रवाह को मानते हैं जिसे श्री अरविन्द और लाल-बाल-पाल की त्रयी ने परिभाषित किया था। 

देश में ऐसे सैंकड़ों आई.ए.एस., आई.एफ.एस. और आई.पी.एस. अधिकारी होंगे जो बालपन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को मानते हैं और उसे देश के लिए हितकारी समझते हैं लेकिन उनमें से एक भी सरकारी नौकरी में यह कहते हुए डरता है क्योंकि ऐसा घोषित करने पर उसके विरुद्ध तत्काल सरकारी कार्रवाई हो जाएगी। सरकार में कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थक होने पर कोई दिक्कत नहीं है- जिस कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को पं. नेहरू की सरकार ने 1962 के युद्ध में चीन का साथ देने के अपराध में गिरफ्तार किया था जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों को 1962 में देश की सेवा और सैनिकों का साथ देने के कारण 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में पूर्ण गणवेश में नेहरू सरकार ने शामिल किया था।

हिन्दुत्व समर्थक का परिचय मिलते ही कार्पोरेट जगत और सामाजिक क्षेत्र में एक भिन्न दृष्टि से देखे जाने का चलन कांग्रेस और वामपंथियों ने शुरू किया जिनके राज में हजारों सिख मारे गए, सबसे ज्यादा हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए, सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार की घटनाएं हुईं, संविधान का उल्लंघन हुआ, आपातकाल लगा, व्यक्तिगत स्वतंत्रताएं समाप्त हुईं, देश पिछड़ गया, महिलाएं असुरक्षित हुईं और विदेशों में भारत की छवि खराब हुई, वे केवल मीडिया पर अपने प्रभुत्व एवं सरकारी तंत्र के दुरुपयोग से स्वयं को सैकुलर, शांतिप्रिय, संविधान के रक्षक और मुस्लिम हित ङ्क्षचतक के रूप में दिखाते रहे।

सलमान रुशदी की पुस्तक ‘सेटेनिक वर्सेज’ पर जो प्रतिबंध की वकालत करते रहे, वही हिन्दू धर्म पर लिखी वैंडी डॉनिगर की अपमानजनक पुस्तक को बेचने की वकालत करते रहे। हिन्दुओं पर आघात आघात नहीं लेकिन अहिन्दुओं पर ताना भी कसा गया और जिसकी सबने ङ्क्षनदा भी की हो तो भी वह प्राण लेने वाला गुनाह मान लिया जाता है। कश्मीर से पांच लाख हिन्दू आज भी बाहर हैं। भारत के किसी गांव से 5 गैर-हिन्दू भी यदि किसी भेदभाव के शिकार होकर निकाल दिए जाएं तो दुनिया भर में तब तक तूफान मचा रहेगा जब तक वे 500 सिपाहियों के संरक्षण में वापस नहीं लौटा दिए जाते। भारत की दर्जनों राजनीतिक पार्टियों के चुनाव घोषणा पत्र में वह एक पंक्ति को ही दिखा दें  जिसमें कहा गया हो कि अगर उस पार्टी की सरकार आएगी तो वह ससम्मान और ससुरक्षा कश्मीरी हिन्दुओं की घर वापसी घोषित करेगी। सिवाय भाजपा के और कौन कहता है? इसका कारण क्या है?

जो लोग फिलस्तीन के मुस्लिम दर्द पर बोलते हैं, इसराईल के विरुद्ध दिल्ली में प्रदर्शन करते हैं और बम फोड़ते हैं, जिन्हें इस्लामी मालदीव और चीन के सिंकियांग में मुस्लिम मोह पर चीनी कार्रवाई से दर्द होता है, वे अपने ही रक्तबंधु हिन्दुओं के पाकिस्तान और बंगलादेश में अमानुषिक उत्पीडऩ पर खामोश क्यों रहते हैं?

गत एक सप्ताह में पाकिस्तान में 2 हिन्दू मंदिर अपवित्र किए गए, मूर्ति जला दी गई और हिन्दुओं का अपमान किया गया। इसके विरोध में आपने कहीं कोई आवाज सुनी? अब इस समाचार में मंदिर की जगह मस्जिद लिखिए और फिर सोचिए कि अगर हमारे या हमारे मुल्क के आसपास कहीं गैर-मुस्लिमों ने मस्जिदों के साथ यही काम किया होता तो क्या नतीजा निकलता?

हिन्दुओं को अपना अपमान सहन करने, अपना दुख पीने और अपने ऊपर होने वाले आघात स्वाभाविक मानने की आदत क्यों हो गई है? क्यों आग्रही हिन्दू उस शासन में जो उनके राजस्व और वोट से चलता है, केवल इसलिए तिरस्कृत और सूचीविहीन किया जाना स्वीकार कर लेते हैं कि वे हिन्दुत्व समर्थक हैं? अस्पृश्यता और तिरस्कार का जितना भयानक दंश हिन्दुत्व समर्थकों ने झेला है, वैसा नाजियों के हाथों यहूदियों ने भी नहीं झेला होगा।  

Wednesday, April 2, 2014

महासमर.. श्राइन बिल का एजेंडा तय करेगा पंडितों का वोट

http://www.jagran.com/jammu-and-kashmir/jammu-11202826.html
जम्मू : दो दशकों से भी अधिक समय से विस्थापन में रह रहा कश्मीरी पंडित समुदाय कश्मीर में पुनर्वास व वापसी में देरी के लिए न सिर्फ राज्य व केंद्र सरकार को जिम्मेदार मान रहा है, बल्कि प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रति भी उनके मन में गिला है। उन्होंने उनकी बेबसी से हमेशा ही पल्ला छुड़ाया है। वादी में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे पंडितो को उन राजनीतिक दलों के प्रति भी मन में मलाल है, जिन्होंने मंदिरों व धार्मिक स्थलों के संरक्षण के लिए विधानसभा में लंबित कश्मीरी हिंदू श्राइन बिल को पारित न होने देने में अहम भूमिका निभाई थी।