Monday, October 20, 2008

Right wing organisations call for Goa Bandh

19 October 2008 Panaji (PTI): The Hindu right wing organisations in the state have given a call for Goa bandh on Monday to protest the recent incidence of desecration of idols in the state.

Grouped under the banner of Mandir Suraksha Samiti, the organisations including Bajrang Dal and Hindu Jangaruti Samiti have flayed the state government for its failure to arrest people behind such acts.

Over 500 places places of religious significance were desecrated in the recent past.

"We appeal to the people to participate wholeheartedly in the bandh and make it successful," the organisers had said earlier this week during a press conference.

Goa government has taken the strike call seriously and promulgated Section 144 of CrPc prohibiting processions, demonstrations, bandh, strikes, road closures and forcible closure of shops and other establishments on October 20 between 6 am and 6 pm.

"We appeal people to desist from participating in the bandh. Government will provide adequate security to all the shops and establishments, which would not respond to the bandh," Goa Chief Minister Digamber Kamat told a press conference yesterday.

"These shrines are in the isolated places. There is a systematic effort to tamper communal harmony in the state," Kamat said.

अल्पसंख्यक युवकों को कोचिंग करायेगी प्रदेश सरकार

दैनिक जागरण, २० अक्तूबर २००८, लखनऊ: अल्पसंख्यक युवकों को नौकरी के लिए प्रदेश सरकार कोचिंग करायेगी। मुख्यमंत्री मायावती ने अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को निर्देश दिये हैं कि कोचिंग की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिये जिससे वे पुलिस, सुरक्षा बल, पब्लिक सेक्टर, रेलवे, बैंक, बीमा कम्पनियों और स्वायत्तशासी संस्थाओं में ज्यादा से ज्यादा संख्या में नौकरी पा सकें। मुख्यमंत्री ने निर्देशों में कहा है कि इंटरमीडिएट, डिग्री अथवा पीजी की शिक्षा पूरी करने वाले अल्पसंख्यक वर्ग के युवकों को प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए कोचिंग की जरूरत होती है, पर फीस अत्यधिक होने के कारण गरीब बच्चे इसे हासिल नहीं कर पाते। ऐसे में सरकार का दायित्व है कि वह इन बच्चों को यह सुविधा उपलब्ध कराये। मुख्यमंत्री ने निर्देशों में कहा है कि अल्पसंख्यक बच्चों को इंजीनियरिंग, लॉ, मेडिकल, बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन और आईटी कालेजों में प्रवेश दिलाने के लिए भी कोचिंग की सुविधा प्रदान की जाय। कहा गया है कि अल्पसंख्यक युवकों को उनके ही जिलों में उस कोचिंग से परीक्षा की तैयारी करने की सुविधा दी जायेगी जिसके माध्यम से लगातार तीन वर्षो तक 15 प्रतिशत सफलता रिकार्ड रहा हो। अल्पसंख्यक छात्रों को कोचिंग की सुविधा दिये जाने में सहयोग देने के लिए मंडलायुक्त की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जायेगी, जिसमें जिलाधिकारी, जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्था के प्रतिनिधि विश्र्वविद्यालय अथवा महाविद्यालय के प्रोफेसर या प्रधानाचार्य प्रतिष्ठित समाजसेवी तथा शिक्षाविद शामिल होंगे। कोचिंग संस्थाओं के चयन हेतु शासन स्तर पर समिति का गठन किया गया है, जिसके अध्यक्ष, सचिव अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ होंगे। इस योजना के तहत ऐसी कोचिंग संस्थाएं जो राष्ट्रीय अथवा राज्य स्तर पर प्रतिष्ठा पा चुकी हैं, चाहे वे अन्य राज्यों में हों, इस योजना में आच्छादित मानी जायेंगी। अल्पसंख्यक छात्रों को इन कोचिंग में भेजा जायेगा और अनुदान भी दिया जायेगा।

Sunday, October 19, 2008

जामिया मुठभेड़: प्रधानमंत्री से मिले नेता

18 अक्टूबर 2008 ,वार्ता , नई दिल्ली। कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर उन्हें जामिया नगर के बाटला हाउस मुठभेड़ कांड को लेकर उठ रही शंकाओं से अवगत कराया तथा इन्हें दूर करने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने की मांग की।

कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के एक प्रतिनिधिमंडल में शामिल इन नेताओं ने डॉ. सिंह को ताजा हालत की जानकारी दी और उनसे आग्रह किया कि गत 19 सितंबर को हुई इस मुठभेड़ को लेकर मुसलमानों में तरह-तरह के प्रश्न उठ रहे हैं, उनका जवाब दिया जाना चाहिए।

प्रतिनिधिमंडल कांग्रेस महासचिव मोहसिना किदवई, पूर्व केंद्रीय मंत्री सीके. जाफर शरीफ और सलमान खुर्शीद, राज्यसभा के उपसभापति के रहमान खान, अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष इमरान किदवई तथा अनीस दुर्रानी शामिल थे।

दुर्रानी ने बताया कि हमने इस मुठभेड़ की न्यायिक जांच कराने की मांग नहीं की लेकिन हम चाहते हैं कि सरकार की ओर से शंकाओं को दूर करने का जल्द से जल्द प्रयास किया जाना चाहिए।

आधा घंटे से अधिक समय तक चली इस बैठक में नेताओं ने सांप्रदायिक आधार पर समाज को बांटने के चल रहे प्रयासों तथा देश के विभिन्न हिस्सों विशेषकर उड़ीसा और कर्नाटक में इसाइयों पर हो रहे हमलों पर गहरी चिंता जताई।

नेताओं ने कहा कि ऐसी घटनाओं से अल्पसंख्यकों में दहशत और अविश्वास की भावना पैदा हो रही है, जो देश के लिये बहुत खतरनाक है।

इन नेताओं ने मुसलमानों की स्थिति सुधारने के लिए सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू करने की कार्यवाही में तेजी लाने का भी आग्रह किया।

दुर्रानी ने बैठक के बाद बताया कि प्रधानमंत्री ने हमारी बातों को ध्यान से सुना है और कहा है कि अल्पसंख्यकों में विश्वास पैदा करने के लिए जरुरी कदम उठाए जाएंगे।

उल्लेखनीय है कि सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी ने बाटला मुठभेड कांड की न्यायिक जांच कराने की मांग की है।

कांग्रेस ने इस मांग का समर्थन तो नहीं किया है लेकिन उसने साफतौर पर कहा कि इस मुठभेड के बारे में स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।

पार्टी ने इसके लिए सरकार पर दवाब बनाना भी शुरु कर दिया है। पार्टी के कई नेताओं ने शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कर इसी तरह की मांग की थी। पार्टी के अल्पसंख्यक विभाग की सलाहकार परिषद की पिछले दिनों हुई बैठक में यही मुद्दा छाया रहा।

क्रिमिनल की गिरफ्तारी पर पब्लिक ने किया बवाल

दैनिक जागरण, १८ अक्तूबर २००८, मऊ। नगर में शुक्रवार की आधी रात को प्रशासनिक तत्परता ने स्थिति को विस्फोटक होने से बचा लिया। मामला था दक्षिण टोला थाना क्षेत्र के डोमनपुरा निवासी एक युवक की गिरफ्तारी के विरोध का। दरअसल जमशेद नामक युवक को पिस्टल एवं 16 कारतूस के साथ एसओजी ने भीड़भाड़ वाले मिर्जाहादीपुरा क्षेत्र से उठा लिया। इससे आक्रोशित होकर काफी संख्या में इकट्ठे हुए लोगों ने थाने का घेराव कर अभियुक्त को छोड़े जाने की मांग की। सफल न होने पर पथराव शुरू कर दिया गया। इसमें थानाध्यक्ष आरडी शुक्ल घायल हो गये। पुलिस द्वारा इस घटना में डेढ़ सौ लोगों के विरुद्ध भादंसं के तहत 147, 148, 149, 332, 352, 353, 7 क्रिमिनल ला अमेंडमेंट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गयी है।

पुलिस के अनुसार दक्षिण टोला थाना क्षेत्र के डोमनपुरा मुहल्ला निवासी जमशेद के पास पिस्टल एवं 16 कारतूस होने की सूचना पर एसओजी टीम के सदस्यों ने उसे गिरफ्तार कर लिया। चूंकि पुलिस टीम के सदस्य सादे वेश में थे इसलिये आसपास के लोगों को गलतफहमी हो गयी। लोग थाने पर सूचना देने पहुंच गये कि बदमाशों ने जमदेश का अपहरण कर लिया है। पुलिस के सेट भी घनघनाने लगे। थोड़ी ही देर में नगर की नाकेबंदी भी कर दी गयी लेकिन जब पुलिस अधिकारियों को वास्तविकता मालूम हुई तो उन्होंने लोगों को जानकारी दी कि जमशेद को बदमाश नहीं पुलिस ने गिरफ्तार किया है। लोग इस जानकारी से संतुष्ट नहीं हुए और बड़ी संख्या में दक्षिण टोला थाना पहुंचकर घेराव प्रारंभ कर दिया। सूचना पाकर सीओ सीटी विद्या सागर मिश्र व प्रभारी निरीक्षक जेपी तिवारी भारी फोर्स लेकर मौके पर पहुंच गये। उधर पुलिस द्वारा अभियुक्त को न छोड़े जाने को लेकर उग्र भीड़ द्वारा थाना भवन पर पथराव शुरू कर दिया गया। पुलिस ने उग्र भीड़ को तितर-बितर करने के लिये हल्का बल प्रयोग करते हुए लोगों को खदेड़ दिया। इस संबंध में जहां गिरफ्तार जमशेद का 25 आ‌र्म्स एक्ट के तहत चालान कर दिया गया वहीं डेढ़ सौ अज्ञात लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गयी है।

Friday, October 17, 2008

Historic Hindu temple burnt

17-Oct-2008 , FIJI DAILY POST। A HINDU temple built in 1905 by Indian indenture labourers has burnt in what is alleged by some to be another act of sacrilege which is becoming common in the country।

The Kendrit Sanatan Dharm Shiv Mandhir at the premises of the Nadi Primary School in Narewa was set ablaze by some unknown people early yesterday morning.

The temple was one the oldest in the country and was a popular spot for many Hindu devotees from Fiji and abroad.

According to temple manager Prem Sharma at around 3am yesterday some people noticed smoke coming out of the temple and the National Fire Authority (NFA) Nadi was alerted.

Sharma said that by the time the firefighters arrived on the scene the corrugated iron, timber and concrete building was completely ablaze.

“All belongings inside the temple was completely burnt along with extensive damage done to the temple exterior,” he said.

“We believe someone entered the temple with the intention of burning it as fire started from a wooden box inside the temple.”

“Also this is a sure case of sacrilege because the idol of Lord Shiva was damaged prior to the temple being set alight,” said Sharma.

He added that those people who had committed the crime were “religious fanatics and have no love for other religions.”

Sharma has urged the authorities teach people to respect each other’s religions.

“It’s very sad that only the Hindu places of worship are being targeted while we hardly see any Indians showing any form of disrespect or damaging churches or other places of worship.

The Shree Sanatan Dharm Brahman Purohit Sabha of Fiji also strongly condemned the action.

Sabha national secretary Umeshwar Ram Sharma said such acts were only carried out by “cowards”.

Sharma who used to perform the Holy Ramayan at the temple every Monday said they would work hard to rebuild it soon with the help of members of the temple and the community there.

Meanwhile, Deputy Divisional Crime Officer Western ASP Waisea Kadawa said yesterday that police were still investigating the case and no arrests were made.

ममता करेंगी बाटला हाउस का दौरा

5 अक्टूबर २००८, वार्ता, नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी आगामी 17 अक्टूबर को राजधानी के जामियानगर इलाके के ‘बाटला हाउस’ का दौरा करेंगी, जहां पिछले दिनों आतंकवादियों और पुलिस के बीच मुठभेड़ में दो आतंकवादी मारे गए थे तथा दिल्ली पुलिस के एक इंस्पेक्टर शहीद हो गए थे।

पार्टी सूत्रों ने बुधवार को बताया कि बनर्जी सहित पार्टी के 21 सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल के बाटला हाउस दौरे का मकसद अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति सहानुभूति एवं हमदर्दी जताना है। तृणमूल नेता मुठभेड़ की घटना की न्यायिक जांच की भी मांग कर सकती हैं।

सूत्रों के मुताबिक इस प्रतिनिधिमंडल में कोलकाता के टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम भी शामिल होंगे।

गौरतलब है कि कई संगठन इस मुठभेड़ को फर्जी ठहराते हुए इसकी जांच की मांग कर चुके हैं। इस क्षेत्र के अधिकतर लोगों का कहना था कि मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादी नहीं बल्कि छात्र थे।

Thursday, October 16, 2008

मलेशिया ने हिंदू संगठन पर प्रतिबंध लगाया

15 अक्टूबर 2008 , रॉयटर्स , कुआलालम्पुर। मलेशिया सरकार ने देश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ कथित भेदभाव को लेकर पिछले वर्ष विरोध का झंडा बुलंद करने वाले हिंदू संगठन हिंदू राइट ऐक्शन ग्रुप (हिंद्राफ) पर आज प्रतिबंध लगा दिया।

गृह मंत्री सैयद हामिद अलबर ने कहा “हिंद्राफ को गैर कानूनी संगठन घोषित करने का फैसला इसकी एक या दो गतिविधियों के आधार पर नहीं बल्कि इस बात के पुख्ता सबूत के बाद लिया गया कि संगठन कानून और नैतिकता के लिए खतरा बन गया है।”

उन्होंने कहा कि अपनी मांगों के सामने सरकार को झुकने के लिए विवश करने के वास्ते उसने बाहरी देशो से भी समर्थन हासिल करने की कोशिश की थी।

विपक्षी डेमोक्रेटिक ऐक्शन पार्टी ने प्रतिबंध की यह कहकर निन्दा की कि हिंद्राफ पर प्रतिबंध लगाने के लिए गृह मंत्रालय की कड़े से कड़े शब्दों में आलोचना की जानी चाहिए। डीएपी के नेता लिम किट सियांग ने कहा “इससे भारतीय मूल के समुदाय में असंतोष और बढेगा।”

मलेशिया ने हिंद्राफ के पांच कार्यकर्ताओं को पिछले वर्ष नवंबर से ही आंतरिक सुरक्षा कानून के तहत हिरासत मे ले रखा है जिसमें बिना सुनवाई के आरोपी को अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखने का प्रावधान है।

देश की करीब दो करोड 70 लाख की आबादी में सात प्रतिशत भारतीय मूल के लोग हैं। चीनी मूल के मलेशियाई लोगों के साथ भारतीय मूल के लोगों ने भी मलेशिया सरकार की स्थानीय मुसलमानों को वरीयता देने वाली नीतियों के खिलाफ विरोध दर्ज किया था।

गुमराह करने वाले हितैषी

आतंकवाद के संदर्भ में मुस्लिम समुदाय को गुमराह करने वाले वक्तव्यों से सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं राजनाथ सिंह सूर्य

दैनिक जागरण १५ अक्तूबर २००८, जब कभी आतंकी घटनाओं के संदर्भ में पुलिस की धरपकड़ तेज होती है तब यह बयान बार-बार दोहराया जाता है कि मुसलमानों को आतंकवाद से नहींजोड़ा जाना नहीं चाहिए, मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, इस्लाम में आतंक या अतिवादी कार्रवाई की इजाजत नहीं है आदि-आदि। वर्षों से इस प्रकार की अभिव्यक्ति सुनते रहने के कारण यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि कौन है जो सभी मुसलमानों को आतंकवादी मान रहा है या फिर इस्लाम को आतंक से जोड़ रहा है? यूरोपीय देशों में आतंकी घटनाओं के बाद 'इस्लामी टेररिस्ट' शब्द का प्रयोग हुआ है। इसकी वजह यह है कि इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम देने के सूत्रधार चाहे पहले लीबिया के गद्दाफी रहे हों या अब ओसामा बिन लादेन-सभी ने अपने को इस्लाम का अलंबरदार घोषित किया। यूरोप और अमेरिका में इस्लाम के अनुयायियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा। बावजूद इसके चाहे अमेरिका हो या इंग्लैंड अथवा यूरोप के अन्य देश, न तो इस्लाम के नाम से पहचाने जाने वाले सभी संगठनों को गैर-कानूनी घोषित किया गया है और न इस्लामी देशों के समान गैर-इस्लामी आस्था वालों पर लगे प्रतिबंधों का अनुशरण किया गया है। जिन संगठनों ने स्वयं ही आतंकी घटनाओं को अंजाम देने का दावा किया या सबूत मिले उन्हें अवश्य प्रतिबंधित किया गया तथा उस देश के कानून के मुताबिक उनके विरूद्ध कार्रवाई भी की गई। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अपने देश के आतंकी संगठनों के विरुद्ध अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया। पिछले तीन दशक से इस्लामी आस्था पर कथित आघात के प्रतिशोध में हो रही आतंकी घटनाओं में जितने लोग मारे गए हैं उतने तो किसी युद्ध में भी नहीं मारे गए। इस प्रकार के जुनून वालों के हमले से सबसे पवित्र तीर्थ माना जाने वाला मक्का भी महफूज नहीं रहा। धीरे-धीरे अनेक देश, जिनमें इस्लामी देश भी शामिल हैं, इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम देने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के पक्ष में खड़े हो गए हैं।

भारत में आतंकी घटनाओं की पृष्ठभूमि अलग है। पाकिस्तान और बांग्लादेश, दोनों देशों के सत्ता प्रतिष्ठान अपने मंसूबों की पूर्ति के लिए इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम देते रहे हैं। अब इन घटनाओं में भले ही 'देशी' लोगों की ही मुख्य भूमिका हो, लेकिन सूत्रधार का काम पाकिस्तान और बांग्लादेश ही कर रहे हैं। भारत में वांछित अपराधियों को संरक्षण देने, आतंकी भेजने, आतंकी घटनाओं को अंजाम देने वालों को प्रशिक्षित कर उन्हें विस्फोटक तथा धन मुहैया कराने, घुसपैठ कराकर आबादी का संतुलन बिगाड़ने, जाली नोटों का जखीरा भेजने आदि सभी कामों को पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था आईएसआई कर रही है। इसके ढेरों सबूत हैं। यह संस्था न केवल मजहबी समानता का जुनून पैदाकर मुस्लिम युवकों को गुमराह कर रही है, बल्कि उल्फा एंवं नक्सलवादियों जैसे उग्र अथवा पृथकवादी संगठनों को सभी प्रकार की सहायता दे रही है। पंजाब की जागरूक जनता ने अपने राज्य में आईएसआई की इस साजिश का सफलता से मुकाबला किया। देश के अन्य भागों में उस साहस और सोच का अभाव है। शायद यही कारण है कि जब भी आतंकी घटना के आरोप में गिरफ्तारी होती है, यह शोर मचाने वाले सक्रिय हो जाते हैं कि सभी मुसलमानों को आतंकी न कहा जाए। प्रश्न वही उठ खड़ा होता है कि यह भावना कौन फैला रहा है? न तो किसी राजनीतिक दल ने, न किसी सरकार ने, न प्रशासन ने और न ही किसी हिंदूवादी संगठन ने एक बार भी सभी मुसलमानों के आतंकवाद से जुड़े होने की अभिव्यक्ति की है। यह अभिव्यक्ति मुस्लिम समुदाय का नेतृत्व करने वालों द्वारा भी कभी-कभार ही की जाती है, लेकिन सेकुलरिज्म का जामा पहनकर सांप्रदायिकता के लिए खाद-पानी मुहैया कराने वाले बार-बार इस प्रकार का बयान देकर उन लोगों के मन में भी शंका पैदा करने का काम करते हैं जिनकी इस प्रकार की सोच नहीं है।

न तो मुसलमान आतंकी हैं, न पृथकतावादी, लेकिन आतंकी घटनाओं में शामिल होने के आरोप में जो भी पकड़े गए हैं वे मुसलमान हैं और पाकिस्तानी झंडा हाथ में लेकर कश्मीर घाटी में 'आजादी' की मांग करने वाले भी मुसलमान हैं। जिस प्रकार 1984 के बाद कुछ सालों तक सभी सिख संदेह की नजर से देखे जाते थे उसी प्रकार आजकल की घटनाओं के कारण सभी मुसलमानों के प्रति ऐसी धारणा का प्रभाव संभव है। क्या सिखों के प्रति उस समय बनी धारणा कायम रह सकी? नहीं। सिर्फ इसलिए, क्योंकि स्वयं सिख समुदाय ने आतंकियों से निपटने में जनसहयोग दिया। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि उस अभियान में निर्दोष नहीं सताए गए, लेकिन ऐसा जानबूझकर किया गया, यह आरोप नहीं लगाया गया। हम कैसे देश में रह रहे हैं, जहां सरकार आतंकी कार्रवाई से निपटने के लिए कड़े कानून बनाने की बात कर रही है, आतंकियों को मारने या पकड़ने में सफलता का दावा कर रही है और जिस पार्टी की सरकार है वह फर्जी मुठभेड़ का दावा करने वालों की कतार में खड़ी होकर न्यायिक जांच कराने की मांग कर रही है। किसी भी 'अल्पसंख्यक' आयोग ने कश्मीर से बेघर किए गए हिंदुओं की दशा पर वक्तव्य तक मुनासिब नहीं समझा। मुठभेड़ की न्यायिक जांच की मांग करने वालों ने एक बार भी पाकिस्तानी झंडा लहराते हुए आजादी की मांग करने को देशद्रोह बताने का साहस नहींकिया। अहमदाबाद की घटनाओं के बाद आजमगढ़ का एक इलाका आतंकियों के गढ़ के रूप में प्रगट हुआ, लेकिन इसका खुलासा तो उस अबुल बशर ने ही किया जिसे आतंकी वारदात के संदर्भ में पकड़ा गया। जो लोग इंस्पेक्टर मोहनचंद्र शर्मा की शहादत पर सवाल खड़े करते हैं या संसद पर हमले के दोषसिद्ध आरोपी अफजल की पक्षधरता करते हैं वे मुस्लिमों के हितचिंतक नहींहो सकते। मुसलमानों को आत्मचिंतन करना होगा। वे भयादोहन करने वालों से जितना परहेज करेंगे उतना ही पाकिस्तान के मंसूबे ध्वस्त होंगे।


संकीर्णता का विषाणु

इस्लाम के उदारवादी पक्षों को मजबूत करने की जरूरत पर बल दे रहे है जगमोहन
दैनिक जागरण, १६ अक्तूबर २००८. वैचारिक विषाणु में जमी आतंकवाद की जड़ें जिस तरह राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पर्तो को भेद रही हैं उससे आतंकवाद की समस्या न केवल विभिन्न राष्ट्रों के लिए अलग-अलग रूप से, बल्कि समग्र अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। विश्व शांति और स्वतंत्रता, सहिष्णुता तथा खुलेपन के आधारभूत मूल्य इस बात पर निर्भर करेंगे कि इस बहुआयामी विकट समस्या से कैसे निपटा जाता है? इसमें मिलने वाली सफलता और विफलता ही हमारी सभ्यता की प्रकृति का निर्धारण करेगी। टोनी ब्लेयर ने ठीक ही कहा है, ''मौजूदा आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष सभ्यताओं के बीच टकराव नहीं, बल्कि सभ्यता के संबंध में टकराव है।'' इस वैचारिक वायरस से निपटने का कार्य यूनेस्को या संयुक्त राष्ट्र की नई विशिष्ट एजेंसी के हवाले कर देना चाहिए। यह एजेंसी उन पहलुओं और शक्तियों में सकारात्मक और तीव्र बदलाव लाने में सहायक हो सकती है जो दुनिया में बड़ी संख्या में मुसलमानों के मन-मस्तिष्क को प्रभावित कर रही हैं। यूनेस्को या विशिष्ट एजेंसी ऐसी नीति और कार्यक्रम तैयार करे जो मुस्लिम देशों में प्रबुद्ध नेतृत्व को आगे लाने में सहयोग दें, ताकि मुस्लिम विचारधारा के उन पहलुओं को आगे बढ़ाया जा सके जो मुक्ति, मानवता, बहुलता के पक्ष में हैं तथा विद्वेष फैलाने वाले विचारों को कुचलते हैं।
यह कार्य संविधान में वर्णित 'गतिशील तथा सौहार्दपूर्ण रचनात्मकता' के सिद्धांत का अनुकरण कर पूरा किया जा सकता है। इसका आशय है कि यदि संविधान में दो प्रावधान हैं, जो रूढ़ व्याख्या के कारण एक-दूसरे से टकरा रहे हैं तो उन्हें इस रूप में देखना चाहिए जिससे वे सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण रचनात्मकता में सहायक बनें। एक ऐसी रचनात्मकता जो समयानुकूल हो और जो सहअस्तित्व के उच्चतम स्तर को प्राप्त कर सके। इसके साथ ही जो मानवता को शांति, प्रगति और उत्पादकता की ओर उन्मुख कर सके। बात को स्पष्ट करने के लिए कुरान से दो उद्धरण गाबिले गौर होंगे। पहला है, ''तुम्हारे लिए तुम्हारा पंथ, मेरे लिए मेरा पंथ'' । दूसरा, ''ओ मानवजाति! हमने महिला और पुरुष के एक जोड़े से तुम्हारी रचना की और तुम्हें एक राष्ट्र और कबीला बनाया, ताकि तुम एक-दूसरे को जान सको, न कि एक-दूसरे से तिरस्कार करो'' । इस्लाम की आयतों को संकीर्णता के साथ तोड़-मरोड़ कर पेश करने के खिलाफ इस प्रकार की आयतों पर विशेष रूप से बल देने की आवश्यकता है। कुल मिलाकर मामला व्याख्या पर आकर टिक जाता है। यह वह काम है जो मानव समाज द्वारा किया जाना है। चौथे खलीफा अली इब्न अबी तालिब ने सही ही कहा था, ''यह कुरान है, सीधे शब्दों में लिखी हुई; यह जबान नहीं बोलती; इसकी व्याख्या जरूरी है; और व्याख्या जनता करती है।''
जो यह दावा करते हैं कि इस्लाम के तमाम पहलू दिव्य हैं वे अक्सर भूल जाते हैं कि इन पहलुओं की व्याख्या 'पूरी तरह मानवीय और सांसारिक' है। अफगानिस्तान में तालिबान की इस्लाम की व्याख्या लड़कियों के स्कूल बंद कराने की है। बुनियादी रूप से आज मुद्दा इस्लामिक आतंकवाद का नहीं है, बल्कि ऐसे आतंकवाद का है जो इस्लाम की संकीर्ण, नकारात्मक और तमाम नैतिक व पंथिक मूल्यों को अस्वीकारने वाली व्याख्या करता है। यह ऐसी व्याख्या है जो खुद खुदा की मूलभूत अवधारणाओं से मेल नहीं खाती। यह संयुक्त राष्ट्र के बुनियादी सिद्धांतों और प्रावधानों का भी उल्लंघन करती है। कट्टरपंथी लोग इस्लाम को टूटे चश्मे से देखते हैं और इससे नजर आने वाली विकृत तस्वीर को विश्वासी मुसलमानों को सही बताते हैं। इस प्रकार, समस्या का हल अज्ञानता दूर करने और मुस्लिम जनता को यह बताने में निहित है कि उग्रवादी इस्लाम का जो रूप पेश कर रहे हैं वह सही नहीं है।
अधिकांश मुस्लिम देशों में हालात को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय यह जरूरी हो जाता है कि उग्रवादी तत्वों से छुटकारा पाने और उदार इस्लाम से निकली शक्तियों का आधिपत्य स्थापित करने के लिए जोरदार पहल की जाए। इसके साथ ही मोहम्मद वहाब, सैयद कुत्ब, मौलाना मौदूदी, ओसामा बिन लादेन, अल जवाहिरी और ऐसे अन्य तत्वों के इस्लामिक विचारों को हतोत्साहित करने की जरूरत है। इनके विचार असाधारण रूप से संकीर्ण और रूढ़ हैं। वे उदारता को सांस्कृतिक भ्रष्टाचार के रूप में देखते हैं और खुद के द्वारा विवेचित शरीयत को लोगों के निजी और सार्वजनिक जीवन में लागू करना चाहते हैं। या तो अनुचित व्यग्रता या फिर एकीकृत सोच के अभाव में वे गलत निष्कर्षो पर पहुंच जाते हैं और गलत सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं। कभी-कभी वे अपनी पूर्वकल्पित धारणाओं को आध्यात्मिक आग्रहों से जोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए कुरान में पंथ त्याग देने वाले दूसरे मुसलमानों को मारने की मनाही के बावजूद सैयद कुत्ब उन्हें मौत का हकदार बताते हैं।
कुत्ब की तरह वहाब और मौदूदी जैसे विचारकों ने भी इस्लामिक सोच में उग्रवादी रूढि़ता की शुरुआत की। उन्होंने जमाल अल-दीन अल-अफगानी और मोहम्मद अब्दुह जैसे महान विद्वानों के विचारों की पूरी तरह अनदेखी की। इन विद्वानों का कहना था कि आधुनिकता के साथ इस्लाम की असंगतता सही नहीं है। उन्होंने प्रतिपादित किया कि प्रकृति और विज्ञान के नियम भी अल्लाह के नियम हैं और तर्क व विवेचनात्मक गुण भी अल्लाह की देन हैं। दूसरे शब्दों में, दोनों तरह के नियमों यानी कुरान और हदीस में उल्लिखित नियमों और प्रकृति के नियमों का एक ही स्त्रोत है और दोनों बराबरी के हकदार हैं। इसी प्रकार सर मुहम्मद इकबाल ने अपनी महत्वपूर्ण रचना 'इस्लाम में पंथिक विचार का निर्माण' में लिखा है, ''इस्लाम का पैगंबर प्राचीन और आधुनिक संसार के बीच खड़ा है। जहां तक इलहाम के स्त्रोत का संबंध है, यह प्राचीन संसार से संबंध रखता है और जहां तक इलहाम की भावना का सवाल है तो यह आधुनिक संसार से संबद्ध है। उनमें जीवन नई दिशा के उपयुक्त ज्ञान के अन्य स्त्रोतों की खोज करता है। इस्लाम का जन्म प्रेरक बौद्धिकता का जन्म है।'' इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र, यूनेस्को या फिर किसी ऐसी एजेंसी के लिए यह लाजिमी हो जाता है कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के हित में नई पहल करे। एक ऐसा तंत्र विकसित किया जाना चाहिए जो गतिशील इस्लाम के पक्षधर विचारकों को प्रेरित करने के लिए नई राह और साधन उपलब्ध कराए।
वैश्विक मानवीय व्यवस्था कायम करना समय की जरूरत है। यह हैरानी की बात है कि आतंक का राज खत्म करने के लिए अब तक इस प्रकार के कदम क्यों नहीं उठाए गए हैं? क्या यह संयुक्त राष्ट्र का कर्तव्य नहीं है कि वह मानवता की शांति और बहुलता के लिए प्रेरणास्त्रोत का काम करे। संयुक्त राष्ट्र को कुछ प्रस्ताव पारित करने या फिर सदस्य देशों को निर्देश देने भर से संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। उसे लोगों के दिलोदिमाग से कट्टरपंथी विचारों को निकाल फेंकने के लिए तात्कालिक और दीर्घकालीन ठोस उपाय करने चाहिए और इन विचारों के स्थान पर उदारवादी इस्लाम में यकीन रखने वाले विद्वतजनों के विचारों को भरना चाहिए। ये उपाय इस्लाम को सकारात्मक शक्ति के रूप में देखने वाले प्रबुद्ध वर्र्गो के लिए सहयोग का विषय बनेंगे। वैचारिक वायरस के खात्मे के लिए ये उपाय ही सही दवा का काम कर सकते हैं।

धीमी पड़ रही है आतंक के खिलाफ मुहिम

दैनिक जागरण, १६ अक्तूबर २००८। अभी तो आतंकवाद के खिलाफ सुनियोजित तरीके से काम की शुरुआत ही हुई थी। संप्रग सरकार के कार्यकाल में आतंक का नया नाम बने इंडियन मुजाहिदीन की कमर टूट चुकी है, लेकिन अभी उसका सफाया बाकी है। इतना ही नहीं, आतंक के अन्य माड्यूल के बारे में तो विभिन्न राज्यों की पुलिस और खुफिया एजेंसियां शुरुआती सुराग पा सकी हैं और उसे ध्वस्त करने के लिए लंबा काम बाकी है। मगर चुनावी सियासत के आगे आतंक के खिलाफ मुहिम की रफ्तार धीमी पड़ने की आशंका बलवती हो गई है।

उच्चपदस्थ सूत्रों के मुताबिक, गृह मंत्रालय और खुफिया एजेंसियों के शीर्ष अधिकारी इस नई परिस्थिति से बेहद परेशान हैं। संप्रग सरकार के कार्यकाल में पहली बार आतंकवादियों के खिलाफ पूरे देश में सामूहिक अभियान चला और एक मूड बना। पिछले कई वर्षो से आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर लगातार असफलता का आरोप झेल रहा खुफिया व पुलिस तंत्र पहली बार शाबासी की उम्मीद कर रहा था। मगर, आईएम का पूरा ढांचा ध्वस्त करने के पर्याप्त सुबूतों के बावजूद जिस तरह से राजनीति हुई, उससे वह हतप्रभ है।

खासतौर से राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री के इस बयान कि 'आतंकवाद निरोधक कार्रवाई में किसी वर्ग विशेष में असुरक्षा या अन्याय की भावना नहीं घर करे।' का सुरक्षा एजेंसियों के हौसलों पर भी असर पड़ा है। सूत्रों के मुताबिक, आतंकवादियों के खिलाफ हुई कार्रवाई पर जिस तरह से राजनीति शुरू हुई थी, उसके बाद गृह मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन से भी चर्चा की थी। उन्होंने आतंकवादी विरोधी कार्रवाई के पक्ष में बयान भी दिए, लेकिन गृह मंत्रालय के सूत्र कहते हैं कि उड़ीसा और कर्नाटक में अल्पसंख्यकों पर बजरंग दल जैसे अतिवादी हिंदू संगठनों के कृत्य ने काफी बेड़ा गर्क किया है।

गृह मंत्रालय और कांग्रेस के शीर्ष सूत्रों के मुताबिक, आतंकवाद के खिलाफ मुहिम में सिर्फ एक वर्ग के लोग पकड़े गए। उधर, बजरंग दल के कार्यकर्ता उड़ीसा व कर्नाटक के अलावा अन्य राज्यों में भी उग्र प्रदर्शन करते दिखे। सियासतदानों के साथ-साथ कई मुसलिम उलेमा भी कांग्रेस व सरकार के खिलाफ तकरीरे गढ़ने लगे। अल्पसंख्यकों के खिलाफ माहौल बताने की जो जुबानी सियासत शुरू हुई, उससे आतंकवाद के खिलाफ मुहिम कमजोर हुई।

सियासत के इस अंदाज से आतंकवादियों के खिलाफ पिछले दिनों हुए देशव्यापी 'आपरेशन' से जुड़े रहे एक शीर्ष अधिकारी के शब्दों में सुरक्षा एजेंसियों की यह व्यथा समझी जा सकती है। वह कहते हैं कि 'सियासत और मीडिया के एक तबके ने जामिया नगर मुठभेड़ से लेकर मुंबई, गुजरात, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में हर जगह हुई गिरफ्तारी पर संदेह खड़ा कर दिया। बावजूद, इसके कि जो बातें कहीं गई, उनका कोई आधार नहीं था और पुलिस ने बाकायदा सारे तथ्य सामने रखे।' वह कहते हैं कि 'राज्य पुलिस ने ज्यादा वाहवाही लूटने के लिए भले ही एक-दूसरे से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हो, लेकिन अभी तक तथ्यों से इतना साफ है कि गिरफ्तार लोगों में से कोई निर्दोष नहीं था।'